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बेरोज़गारी का बढ़ता संकट: क्या भारत का युवा सिर्फ़ आंकड़ों में सिमट कर रह जाएगा?

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है, लेकिन क्या उसके युवाओं के पास रोजगार के पर्याप्त अवसर हैं? पिछले 10 वर्षों में बेरोज़गारी दर, नोटबंदी, कोरोना महामारी और धीमे रोजगार सृजन ने लाखों युवाओं के भविष्य पर सवाल खड़े किए हैं। डिग्रियां बढ़ रही हैं, लेकिन नौकरियां नहीं। आखिर क्यों उच्च शिक्षित युवा छोटी-छोटी भर्तियों के लिए लंबी कतारों में खड़े हैं? पढ़िए भारत में बढ़ती बेरोज़गारी की वास्तविक तस्वीर, सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत का विश्लेषण, और जानिए क्यों रोजगार आज देश का सबसे बड़ा आर्थिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है।

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1. विकास के दावों के बीच बेरोज़गारी का कड़वा सच

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है, लेकिन यही युवा आज रोजगार के लिए सबसे अधिक संघर्ष कर रहा है। पिछले दस वर्षों में सरकारों ने करोड़ों नौकरियों के दावे किए, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। 2016 में बेरोज़गारी दर लगभग 5% थी, जो 2017-18 में बढ़कर 6.1% तक पहुंच गई। यह पिछले 45 वर्षों में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक था। डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ती गई, लेकिन उनके लिए अवसर उसी गति से नहीं बढ़ पाए।

2. नोटबंदी, महामारी और रोजगार पर पड़ा असर

2016 की नोटबंदी और उसके बाद 2020 की कोरोना महामारी ने रोजगार बाजार को गहरा झटका दिया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (CMIE) के अनुसार अप्रैल 2020 में बेरोज़गारी दर 23% से ऊपर पहुंच गई थी। लाखों छोटे व्यापार बंद हुए, असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोग प्रभावित हुए और बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों को अपने गांव लौटना पड़ा। महामारी के बाद अर्थव्यवस्था संभली जरूर, लेकिन रोजगार सृजन की रफ्तार अभी भी अपेक्षाकृत धीमी बनी हुई है।

3. युवाओं के हाथ में डिग्री, लेकिन नौकरी नहीं

आज स्थिति यह है कि इंजीनियरिंग, एमबीए, बीए और यहां तक कि पीएचडी धारक युवा भी प्रतियोगी परीक्षाओं और छोटी सरकारी नौकरियों के लिए लंबी कतारों में खड़े दिखाई देते हैं। कई राज्यों में चपरासी और क्लर्क की भर्तियों में लाखों आवेदन आते हैं, जिनमें बड़ी संख्या उच्च शिक्षित उम्मीदवारों की होती है। 2025-26 में बेरोज़गारी दर राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 7-8% के आसपास बनी हुई है, जबकि युवाओं (15-29 वर्ष) में यह आंकड़ा कई क्षेत्रों में 15% से अधिक बताया जाता है। यह सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और मानसिक चिंता का विषय भी बन चुका है।

4. सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं, भविष्य का है

भारत 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनने का सपना देख रहा है, लेकिन यदि युवाओं को सम्मानजनक रोजगार नहीं मिला तो यह सपना अधूरा रह सकता है। सरकार को कौशल विकास, विनिर्माण क्षेत्र, MSME उद्योगों और स्टार्टअप इकोसिस्टम में बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा। साथ ही रोजगार के वास्तविक आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाना भी जरूरी है। आखिर कब तक युवा सिर्फ़ चुनावी भाषणों में “देश की ताकत” कहलाते रहेंगे? अब वक्त आ गया है कि रोजगार को राजनीतिक नारों से निकालकर राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए।

बेरोज़गारी: पिछले 10 वर्षों की तस्वीर

  1. भारत में 15-29 वर्ष के युवाओं की संख्या लगभग 36.7 करोड़ है।

2025 के PLFS के अनुसार युवा बेरोज़गारी दर (15-29 वर्ष) लगभग 9.9% रही, जबकि कुछ तिमाही सर्वेक्षणों में यह 14-15% तक दर्ज हुई।  अनुमानतः 3.5 से 5 करोड़ युवा या तो बेरोज़गार हैं या अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं पा रहे हैं। (विभिन्न सर्वेक्षण पद्धतियों के कारण आंकड़े अलग-अलग हो सकते हैं)। 2023 में 20-29 आयु वर्ग के 6.3 करोड़ स्नातकों में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोज़गार थे।

  • ओवर-क्वालिफाइड उम्मीदवारों की समस्या

देशभर में चपरासी, क्लर्क, पुलिस कांस्टेबल और ग्रुप-D पदों के लिए लाखों इंजीनियर, MBA और पोस्ट-ग्रेजुएट आवेदन करते रहे हैं। कई भर्ती अभियानों में एक पद पर 100 से 500 तक आवेदन देखने को मिले हैं, जिनमें बड़ी संख्या स्नातक और परास्नातक युवाओं की होती है। यह “डिग्री बनाम नौकरी” संकट का संकेत माना जाता है।

  • पेपर लीक का दंश

2017 से 2026 के बीच देश में कम से कम 93 बड़े पेपर लीक मामले दर्ज किए गए। विभिन्न जांचों के अनुसार 2015-2025 के दौरान 70 से अधिक पुष्ट पेपर लीक घटनाओं ने 1.7 करोड़ से अधिक छात्रों और अभ्यर्थियों को प्रभावित किया। कुछ मीडिया विश्लेषणों में 2014-2024 के दौरान 89 पेपर लीक मामलों से 6.5 करोड़ उम्मीदवारों के प्रभावित होने का दावा किया गया है। UGC-NET 2024, NEET 2024, NEET 2026, विभिन्न राज्य पुलिस भर्ती, शिक्षक भर्ती और अन्य प्रतियोगी परीक्षाएं रद्द या पुनः आयोजित करनी पड़ीं।

निष्कर्ष –

36 करोड़ से अधिक युवाओं वाले देश में लाखों डिग्रीधारी नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं। करोड़ों अभ्यर्थी वर्षों तैयारी करते हैं, लेकिन कभी भर्ती रद्द हो जाती है, कभी पेपर लीक हो जाता है और कभी पद ही कम कर दिए जाते हैं। सवाल सिर्फ बेरोज़गारी का नहीं है, सवाल उस भरोसे का है जो भारत का युवा व्यवस्था पर करता है। यदि रोजगार, पारदर्शी भर्ती और परीक्षा सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हुई, तो देश का जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती में बदल सकता है।

Writer – Sita Sahay

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